केवल परमेश्वर ही संतुष्ट कर सकता है

केवल परमेश्वर ही संतुष्ट कर सकता है

एक वर मैंने यहोवा से माँगा है, उसी के यत्न में लगा रहूँगा; कि मैं जीवन भर  यहोवा के भवन में रहने पाऊँ, जिससे यहोवा की मनोहारिता पर दृष्टि  लगाए रहूँ, और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूँ। -भजन संहिता 27:4

वर्षों तक प्रभु के साथ लगातार संगति के समय को व्यतीत करने के महत्व के बारे में बिना जाने चर्च जाती रही। मैं यह सब कुछ यह जानकर करती थी कि उस समय मुझे यह करना है; परन्तु परमेश्वर के लिए मेरी प्यास को तृप्त करने के लिए यह काफ़ी नहीं था। मैं प्रत्येक क्षण को कलीसिया में अथवा बाइबल अध्ययन में व्यतीत कर सकती थी; परन्तु यह मेरी उस प्यास को नहीं बूझा सकती थी। क्योंकि प्रभु के साथ एक गहरी संगति मेरे भीतर थी। मुझे उससे अपने भूतकाल के विषय में बात करने की आवश्यकता थी और अपने भविष्य के बारे में उसे कहते हुए सुनने की ज़रूरत थी। परन्तु किसी ने भी मुझे नहीं सिखाया कि परमेश्वर मुझसे बात करना चाहता है। मेरी असंख्य भावनाओं के लिए जिनको मैं कहती थी किसी ने भी मुझे हल नहीं दिखाया।

यद्यपि वचन को पढ़ते हुए मैंने सिखा कि परमेश्वर हमसे बात करना चाहता है और भी हमारे जीवनों के लिए वह एक योजना रखता है जो हमें एक शांति और एक संतुष्टि एक स्थान की ओर ले जाएगा। यशायाह ने परमेश्वर के लिए हमारे स्वयं की भूख को अच्छी रीति से अभिव्यक्त किया है जब उसने कहा, “रात के समय मैं जी से तेरी लालसा करता हूँ, मेरा संपूर्ण मन यत्न के साथ तुझे ढूँढ़ता है।” (यशायाह 26:9) परमेश्वर के लिए हमारी प्यास को और कुछ भी संतुष्ट नहीं कर सकता है केवल उसके साथ संगति और सहभागिता।

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